भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिन्होंने न केवल इतिहास बनाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमिट प्रेरणा छोड़ गए। इन्हीं में से एक हैं राजमाता जिजाऊ, छत्रपति शिवाजी महाराज की माता। इ.स. 1595 में विदर्भ के सिंदखेडराजा में जन्मी जिजाऊ, बचपन से ही हिन्दुओं पर होने वाले यवनों के अत्याचारों को देखकर क्रोधित होती थीं। वे लखोजीराजे जाधव की सुकन्या थीं और सभी उन्हें प्रेम से 'जिऊ' कहते थे।
राष्ट्रप्रेम की अग्नि: वैमनस्य से स्वराज्य तक
जिजाऊ का विवाह आदिलशाही के पराक्रमी सरदार शहाजीराजे भोसले के साथ हुआ। तत्कालीन मराठी सरदारों में व्याप्त स्वार्थ और वैमनस्य को देखकर उनका मन व्यथित होता था। एक समय ऐसा आया जब जाधव और भोसले परिवारों के बीच भयंकर झगड़ा हुआ। इस दुःखद समय में भी जिजाऊ और शहाजीराजे ने आपसी वैमनस्य को भुलाकर संगठित होने और यवनों से युद्ध कर हिन्दुओं का स्वराज्य स्थापित करने का मनोरथ रखा।
निजाम द्वारा उनके पिता, लखोजीराजे जाधव, और तीन भाइयों की धोखे से हत्या किए जाने पर भी, जिजाऊ का हृदय विदीर्ण हुआ, परन्तु उनके स्वराज्य के विचार नहीं टूटे। आदिलशाह के आदेश पर पुणे को ध्वस्त किए जाने और गधे का हल चलाए जाने जैसी हृदय विदारक घटनाओं ने उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला को सदैव प्रज्वलित रखा।
बाल शिवाजी का निर्माण: राष्ट्रभक्ति की घुट्टी
शिवाजी राजा के जन्म से पूर्व, जिजाऊ भवानीमाता से प्रार्थना करती थीं कि उन्हें 'दुष्टों का नाश करने हेतु प्रभु श्रीराम के समान वीर सुपुत्र' प्राप्त हो। इ.स. 1627 में शिवनेरी किले पर शिवाजी राजा का जन्म हुआ।
जिजाऊ शिवाजी की केवल माता नहीं, बल्कि उनकी प्रेरक शक्ति थीं। उन्होंने बचपन से ही शिवाजी को प्रभु श्रीराम, हनुमान, श्रीकृष्ण, महाभारत एवं रामायण की कथाएं सुनाईं। इन कथाओं के माध्यम से उन्होंने बाल शिवाजी को राष्ट्र एवं धर्मभक्ति की घूंटी पिलाकर एक आदर्श राजा बनने के लिए तैयार किया।
आदर्श राजमाता और कुशल शासकजिजाऊ एक कठोर धर्माचरण करने वाली, उत्तम न्यायदान करने वाली और युद्धकला में कुशल (घोड़े पर सवार होकर तलवारबाजी) महिला थीं। उनके कठोर धर्माचरण के पुण्यबल से ही उन्हें अनगिनत संकटों का सामना करने का बल मिला। उनकी मां भवानी और शंभू महादेव पर दृढ़ आस्था थी।
जब शिवाजी महाराज पन्हाळ के घेरे में फंसे थे या आगरा गए थे, तब प्रौढ़ जिजाऊ ने ८ माह से अधिक समय तक स्वराज्य का सम्पूर्ण कार्यभार उत्कृष्ट पद्धति से संभाला। उन्होंने उत्तम न्यायदान किया और धर्मशास्त्र की जानकार होने के कारण निष्पक्ष निर्णय दिए।
अफजलखान जैसे क्रूरकर्मी से युद्ध के अवसर पर, जब सभी ने शिवाजी महाराज को छिपने की सलाह दी, तब जिजाऊ ने ही उन्हें निर्भयता से मिलकर उसका अन्त करने का आदेश देकर पराक्रम का समादेश दिया।
जिजाऊ ने पत्नी और माता की भावनाओं की अपेक्षा रानी एवं राजमाता के कर्तव्यों को अधिक महत्त्व दिया और प्रजाहित को सर्वाधिक प्राधान्य दिया। शिवाजी राजा के राज्याभिषेक का सुवर्ण अवसर देखने के केवल १२ दिनों बाद, इ.स. 1674 में उन्होंने पाजाड में देहत्याग किया।
राजमाता जिजाऊ का जीवन समस्त हिन्दुओं के लिए
आदर्श हिन्दू नारी, दूरदर्शी राजनेता और
स्वराज्य की आधारशिला का सर्वोत्तम उदाहरण है।