आज 1 अक्टूबर को भारत के राष्ट्रीय पुनर्जागरण, शिक्षा, महिला-जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन की महान अग्रदूत डॉ. एनी बेसेंट की जयंती है। इस पावन अवसर पर मैं उन्हें अत्यंत श्रद्धा, आदर और कृतज्ञता के साथ स्मरण करती हूँ।
डॉ. एनी बेसेंट केवल एक महान शिक्षाविद्, समाजसेविका और राष्ट्रवादी चिंतक ही नहीं थीं, बल्कि भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसकी स्वतंत्रता में अटूट विश्वास रखने वाली ऐसी महान विभूति थीं, जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग भारत की सेवा में समर्पित कर दिया।
काशी के शैक्षिक और सांस्कृतिक इतिहास में उनका योगदान विशेष रूप से अविस्मरणीय है। 1898 में उनके द्वारा स्थापित सेंट्रल हिन्दू कॉलेज और उससे विकसित शैक्षिक परंपरा ने आगे चलकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के स्वप्न को साकार करने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया। डॉ. बेसेंट ने सेंट्रल हिन्दू कॉलेज को महामना को सौंपकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण की दिशा में अपना ऐतिहासिक योगदान दिया। इसी कारण उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह-संस्थापक परंपरा में अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है।
महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान युगांतरकारी था। 1904 में स्थापित कन्या विद्यालय की परंपरा आगे चलकर सेंट्रल हिन्दू गर्ल्स स्कूल के रूप में विकसित हुई। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत का वास्तविक जागरण तभी संभव है, जब उसकी बेटियाँ शिक्षित, आत्मनिर्भर, संस्कारित और जागरूक हों।
वसंत महिला महाविद्यालय, राजघाट की मूल संस्था की स्थापना भी 1913 में डॉ. एनी बेसेंट ने की थी। बाद में यही संस्था विकसित होकर वसंत कॉलेज फॉर विमेन के रूप में अपनी गौरवशाली यात्रा को आगे बढ़ाती रही। वसंत कन्या महाविद्यालय, कमच्छा की शैक्षिक दृष्टि और उसकी ‘Education as Service’ की भावना भी डॉ. एनी बेसेंट की शिक्षा-दृष्टि से गहराई से प्रेरित है।
राष्ट्रीय जीवन में उनका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण था। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रणी राष्ट्रवादी नेताओं में थीं और 1916 में होमरूल आंदोलन को संगठित रूप देने तथा स्वशासन की माँग को जन-आंदोलन का स्वर देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष भी बनीं।
उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति-निर्माण, चरित्र-निर्माण, समाज-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण की शक्ति है। उन्होंने शिक्षा को संस्कृति, नैतिकता, सेवा, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा।
आज उनकी जयंती पर काशी की उन सभी महान शिक्षण संस्थाओं से जुड़े विद्यार्थियों, शिक्षकों, पूर्व विद्यार्थियों, शिक्षाविदों और समस्त परिवार के साथ मैं डॉ. एनी बेसेंट की पावन स्मृति को नमन करती हूँ।
उनकी दूरदृष्टि, शिक्षा के प्रति उनकी आस्था, महिला-जागरण के प्रति उनका समर्पण और भारत के प्रति उनका अटूट प्रेम आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
डॉ. एनी बेसेंट को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन।
-चंद्रकला पाडिया